Ans: योजना आयोग ने गरीबी की परिभाषा मुख्य रूप से न्यूनतम कैलोरी आवश्यकता और उपभोग व्यय (Consumption Expenditure) के आधार पर दी है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी दैनिक उपभोग का मानदंड तय किया गया था, और इसे मासिक आय या व्यय के रूप में भी परिभाषित किया गया था (जैसे 2011-12 में ग्रामीण ₹972 और शहरी ₹1407 प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग)।
मुख्य आधार:
- कैलोरी की आवश्यकता:योजना आयोग ने यह तय किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी प्रतिदिन से कम उपभोग करने वाले व्यक्ति को गरीब माना जाएगा।
- उपभोग व्यय (Consumption Expenditure): इस कैलोरी मानदंड को पूरा करने के लिए आवश्यक न्यूनतम मासिक आय या खर्च के आधार पर भी गरीबी रेखा तय की गई।
- समितियों की सिफारिशें: योजना आयोग ने गरीबी रेखा निर्धारण के लिए विभिन्न समितियों (जैसे तेंदुलकर समिति, रंगराजन समिति) की सिफारिशों का उपयोग किया, जो उपभोग व्यय और कैलोरी के आधार पर ही गरीबी का आकलन करती थीं।
संक्षेप में, योजना आयोग ने गरीबी को आय या उपभोग के उस स्तर से नीचे परिभाषित किया, जहाँ व्यक्ति अपनी बुनियादी पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाता।
2. गरीबी के दो विशिष्ट मामले की विवेचना करें
Ans: गरीबी के दो विशिष्ट मामलों में एक ग्रामीण भूमिहीन मजदूर (जैसे लाखा सिंह का परिवार) जो अनियमित काम, कम मजदूरी, और शिक्षा/स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में जी रहा है, और दूसरा, शहरी गरीब परिवार जो कम आय, खराब आवास, कुपोषण और नौकरी की असुरक्षा जैसी समस्याओं से जूझता है, ये दोनों ही गरीबी के दैनिक जीवन के कठिन अनुभवों को दर्शाते हैं, जहाँ भूख, बेघर होना और बुनियादी ज़रूरतों की कमी जीवन का हिस्सा बन जाती है, जिससे पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी का चक्र चलता रहता है।
1. ग्रामीण गरीबी का मामला: लाखा सिंह का परिवार (उत्तर प्रदेश, भारत)
- भूमिहीनता और अनियमित काम: लाखा सिंह के परिवार के पास कोई जमीन नहीं है, और वे बड़े किसानों के लिए दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। काम अनियमित होता है और आय भी निश्चित नहीं होती, अक्सर मजदूरी अनाज या सब्जियों के रूप में मिलती है।
- परिवार का बड़ा आकार: आठ सदस्यों का परिवार है, और दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल होता है।
- शिक्षा और बाल श्रम: बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, क्योंकि उन्हें छोटी उम्र से ही कमाने के लिए काम पर लगना पड़ता है, जिससे शिक्षा का अवसर छूट जाता है।
- खराब स्वास्थ्य: लाखा के पिता टी.बी. के कारण दवा के अभाव में मर गए, और माँ भी उसी बीमारी से जूझ रही है। स्वास्थ्य सुविधाएं उनकी पहुँच से बाहर हैं।
- बुनियादी सुविधाओं का अभाव: साबुन और तेल जैसी चीजें भी परिवार के लिए विलासिता हैं, और वे मिट्टी की झोपड़ी में रहते हैं।
2. शहरी गरीबी का मामला (एक सामान्य उदाहरण)
- कम आय और असुरक्षित नौकरी: एक दिहाड़ी मजदूर या छोटा विक्रेता, जिसकी आय बहुत कम और अस्थिर होती है, और जिसके पास कोई सामाजिक सुरक्षा या नौकरी की गारंटी नहीं होती।
- खराब आवास और स्वच्छता: वे अक्सर झुग्गियों या कच्चे घरों में रहते हैं, जहाँ स्वच्छ पानी और स्वच्छता की सुविधाएँ नहीं होतीं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
- कुपोषण और स्वास्थ्य: बच्चों का विकास ठीक से नहीं हो पाता, और बीमार होने पर इलाज का खर्च वहन करना मुश्किल होता है, जिससे कई बीमारियाँ पनपती हैं।
- सामाजिक भेदभाव और बेबसी: अक्सर उन्हें हर जगह तिरस्कार और बुरा व्यवहार झेलना पड़ता है, जिससे उनमें एक तरह की बेबसी और असहायता की भावना घर कर जाती है।
इन दोनों मामलों से पता चलता है कि गरीबी केवल पैसे की कमी नहीं, बल्कि अवसरों, स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मान के अभाव का एक बहुआयामी अनुभव है, जो लोगों को मानवीय पीड़ा और बेबसी के जाल में फँसाए रखता है।
3. गरीबी रेखा से आप क्या समझते हैं
Ans गरीबी रेखा (Poverty Line) वह न्यूनतम आय या उपभोग स्तर है, जिसके नीचे आने वाले व्यक्ति या परिवार को गरीब माना जाता है, क्योंकि वे भोजन, कपड़े और आवास जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ होते हैं; यह एक सीमांकन है जो संसाधनों के आवंटन और सरकारी योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है, और इसे कैलोरी की आवश्यकता (भारत में) या मौद्रिक खर्च (अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर) के आधार पर मापा जाता है, जिसे समय-समय पर महंगाई के अनुसार बदला जाता है
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मुख्य बिंदु:
- न्यूनतम आवश्यकता: यह एक ऐसा पैमाना है जो यह तय करता है कि किसी व्यक्ति के पास जीवनयापन के लिए न्यूनतम आय है या नहीं.
- मापन का तरीका:
- भारत में: कैलोरी की खपत (जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों में 2100 कैलोरी) को आधार मानकर, फिर उसे मौद्रिक मूल्य में बदला जाता है.
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर (विश्व बैंक): $2.15 प्रतिदिन (2017 PPP) जैसे एक निश्चित डॉलर मूल्य पर आधारित, जो कि बुनियादी जरूरतों के लिए पर्याप्त आय का प्रतिनिधित्व करता है.
- महत्व: यह गरीबी की पहचान करने, गरीबों की संख्या का अनुमान लगाने और कल्याणकारी योजनाओं (जैसे भोजन, आवास, शिक्षा) के लाभ वितरित करने में मदद करती है.
- बदलाव: महंगाई और जीवनयापन की लागत बढ़ने के कारण गरीबी रेखा के मानकों को साल-दर-साल संशोधित किया जाता है, जिससे गरीबों की संख्या के आंकड़ों में अंतर आता है.
4. क्या आप समझते हैं कि गरीबी आकलन का वर्तमान तरीका सही है
Ans : नहीं, गरीबी आकलन का वर्तमान तरीका पूरी तरह सही नहीं माना जाता क्योंकि यह मुख्य रूप से आय और न्यूनतम कैलोरी खपत पर केंद्रित है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सामाजिक समानता जैसे गरीबी के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं (बहुआयामी गरीबी) को नज़रअंदाज़ करता है, हालांकि इसे बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) जैसे नए तरीकों से सुधारा जा रहा है, लेकिन आय-आधारित आकलन अभी भी अपर्याप्त है।
वर्तमान तरीके की सीमाएँ (Limitations of Current Methods):
- केवल आय पर ध्यान: यह केवल आर्थिक आय या न्यूनतम खर्च के आधार पर गरीबी को मापता है, जबकि गरीबी एक बहुआयामी समस्या है।
- न्यूनतम स्तर, उचित स्तर नहीं: यह जीवन के "न्यूनतम निर्वाह स्तर" पर केंद्रित है, "उचित जीवन स्तर" पर नहीं, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान जैसी चीजें शामिल नहीं होतीं।
- आय और गैर-आर्थिक पहलुओं की अनदेखी: इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, साफ पानी, आवास, नौकरी की सुरक्षा और आत्म-सम्मान जैसे गैर-मौद्रिक पहलुओं को शामिल नहीं किया जाता।
- स्थिरता और क्षेत्रीय अंतर: गरीबी रेखा अक्सर पुरानी हो जाती है और शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में रहने की लागत के अंतर को ठीक से नहीं दर्शाती।
सुधार के लिए नए दृष्टिकोण (New Approaches for Improvement):
- बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI): यह आय के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर (जैसे बिजली, पानी, स्वच्छता) के कई संकेतकों को मापता है, जिससे गरीबी की व्यापक तस्वीर मिलती है।
- व्यापक अवधारणा: विशेषज्ञों का मानना है कि गरीबी को शिक्षा, स्वास्थ्य, नौकरी और गरिमा जैसे अन्य पहलुओं को शामिल करके व्यापक रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
संक्षेप में, वर्तमान तरीके गरीबी को समझने के लिए एक आधार प्रदान करते हैं, लेकिन गरीबी की जटिलता को पूरी तरह से समझने और खत्म करने के लिए उन्हें बहुआयामी संकेतकों के साथ जोड़ना आवश्यक है।
5. किन किन बातों से सिद्ध होता है कि भारतीय गरीब है
Ans: भारतीयों के गरीब होने के प्रमाण निम्न बातों से मिलते हैं: उच्च जनसंख्या वृद्धि, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, संसाधनों का असमान वितरण, कम प्रति व्यक्ति आय, और कृषि पर अत्यधिक निर्भरता; जो मिलकर निम्न जीवन स्तर और आर्थिक असमानता को दर्शाते हैं, भले ही गरीबी उन्मूलन के प्रयास चल रहे हों।
गरीबी के प्रमुख संकेत:
- आय और धन का असमान वितरण: कुछ लोगों के पास अत्यधिक धन है, जबकि बड़ी आबादी के पास कम आय और संपत्ति है, जिससे समाज में बड़ी खाई पैदा होती है।
- बेरोजगारी और अल्प-रोजगार: ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में छिपी हुई बेरोजगारी और अल्प-रोजगार की समस्या है, जिससे लोगों की आय कम रहती है।
- शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव: कई लोग अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च नहीं उठा पाते, जिससे उनकी काम करने और कमाई करने की क्षमता प्रभावित होती है।
- जनसंख्या वृद्धि और संसाधनों पर दबाव: बढ़ती जनसंख्या के कारण प्रति व्यक्ति आय घटती है और संसाधनों पर दबाव बढ़ता है, जिससे गरीबी बढ़ती है।
- कम कृषि उत्पादकता: कृषि क्षेत्र में कम उत्पादकता और आधुनिक तकनीकों का अभाव भी गरीबी का एक कारण है।
- निम्न जीवन स्तर: लाखों लोगों को दो वक्त की रोटी, कपड़े और मकान जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
- आर्थिक विकास की धीमी दर (ऐतिहासिक रूप से): वस्तुओं और सेवाओं की आवश्यकता और उपलब्धता के बीच का अंतर गरीबी को दर्शाता है।
इन संकेतकों के बावजूद:
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भारत ने गरीबी कम करने और समावेशी विकास के लिए कई योजनाएँ (जैसे मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना) चलाई हैं और प्रगति भी की है, लेकिन चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि भारत ने गरीबी कम करने और समावेशी विकास के लिए कई योजनाएँ (जैसे मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना) चलाई हैं और प्रगति भी की है, लेकिन चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं।
6. गरीबी के कारणों में जनसंख्या वृद्धि की क्या भूमिका है
Ans जनसंख्या वृद्धि गरीबी का एक प्रमुख कारण है क्योंकि यह रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे संसाधनों पर भारी दबाव डालती है, जिससे प्रति व्यक्ति आय कम होती है और गरीबी बढ़ती है; वहीं, गरीबी भी परिवार नियोजन की कमी और अधिक बच्चों को आर्थिक सहारा मानने के कारण जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा देती है, जिससे एक दुष्चक्र बनता है।
जनसंख्या वृद्धि गरीबी को कैसे बढ़ाती है
- संसाधनों पर दबाव: अधिक जनसंख्या के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, भोजन और पानी जैसे सीमित संसाधनों पर दबाव पड़ता है, जिससे जीवन की गुणवत्ता घटती है।
- रोजगार की कमी: तेजी से बढ़ती जनसंख्या के अनुपात में रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो पाते, जिससे बेरोजगारी और अल्परोजगार बढ़ता है और गरीबी बढ़ती है।
- प्रति व्यक्ति आय में कमी: जब जनसंख्या तेजी से बढ़ती है, तो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर भी जनसंख्या वृद्धि से कम हो सकती है, जिससे प्रति व्यक्ति आय कम हो जाती है और गरीबी में कमी नहीं आती।
- परिवार पर बोझ: बड़ी संख्या में बच्चों के कारण परिवारों के लिए हर बच्चे में निवेश करना (शिक्षा, स्वास्थ्य) मुश्किल हो जाता है, जिससे उनका भविष्य प्रभावित होता है।
गरीबी जनसंख्या वृद्धि को कैसे बढ़ाती है (दुष्चक्र)
- आर्थिक मजबूरी: गरीब परिवारों में, अधिक बच्चे होने का मतलब परिवार के लिए अधिक कमाने वाले हाथ होना माना जाता है, जिससे परिवार नियोजन को अपनाया नहीं जाता।
- शिक्षा और जागरूकता का अभाव: गरीबी और अशिक्षा के कारण परिवार नियोजन के तरीकों और गर्भनिरोधक के बारे में जागरूकता कम होती है, जिससे परिवार का आकार बड़ा रहता है।
- उच्च बाल मृत्यु दर: खराब स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण बच्चों की मृत्यु दर अधिक होती है, जिससे माता-पिता यह सुनिश्चित करने के लिए अधिक बच्चे पैदा करते हैं कि कम से कम कुछ बच्चे जीवित रहें।
संक्षेप में, जनसंख्या वृद्धि और गरीबी एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं; जहां एक ओर बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर बोझ डालकर गरीबी बढ़ाती है, वहीं गरीबी भी अधिक बच्चों के जन्म को बढ़ावा देकर इस चक्र को जारी रखती है।
7. भारत में गरीबी के किन्हीं चार प्रमुख कारण बताइए
Ans : भारत में गरीबी के चार प्रमुख कारण हैं: जनसंख्या वृद्धि, जिससे संसाधनों पर दबाव बढ़ता है; बेरोज़गारी और कम आय, जो लोगों को बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने से रोकती है; शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, जो कौशल विकास और उत्पादकता को बाधित करता है; और संसाधनों का असमान वितरण एवं सामाजिक असमानता, जो कुछ समूहों को विकास के अवसरों से वंचित रखती है.
भारत में गरीबी के चार प्रमुख कारण:
- जनसंख्या वृद्धि(Population Growth):भारत की तीव्र जनसंख्या वृद्धि ने भोजन, आवास, रोज़गार और अन्य सीमित संसाधनों पर भारी दबाव डाला है, जिससे प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम हो जाती है और गरीबी बढ़ती है.
- बेरोज़गारी और अल्परोज़गार (Unemployment & Underemployment): पर्याप्त रोज़गार के अवसरों की कमी और कम वेतन वाली नौकरियों की व्यापकता लोगों की आय को कम करती है, जिससे वे गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाते हैं.
- शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव (Lack of Education & Health): गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच की कमी लोगों को अच्छी नौकरी पाने और अपनी आय बढ़ाने से रोकती है, जिससे गरीबी बनी रहती है.
- संसाधनों का असमान वितरण (Unequal Distribution of Resources): देश में धन और भूमि जैसे संसाधनों का असमान वितरण गरीबी का एक प्रमुख कारण है; कुछ लोगों के पास बहुत अधिक धन है, जबकि बड़ी आबादी के पास बहुत कम है.
अन्य महत्वपूर्ण कारण:
- कम कृषि उत्पादकता: खेती में आधुनिक तकनीकों और सिंचाई की कमी से किसानों की आय कम रहती है.
- सामाजिक असमानता: जाति और लैंगिक भेदभाव जैसी सामाजिक बाधाएँ कुछ समूहों के आर्थिक विकास को रोकती हैं.
- अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा: सड़क, बिजली और स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी आर्थिक गतिविधियों और जीवन स्तर को प्रभावित करती है.
- भ्रष्टाचार: सरकारी योजनाओं के प्रभावी कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार गरीबी उन्मूलन प्रयासों को कमजोर करता है.
8. भारत में गरीबी निदान के लिए किए गए सरकारी प्रयासों को बताएं
भारत में गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार ने कई कार्यक्रम चलाए हैं, जिनमें मनरेगा (रोजगार), प्रधानमंत्री आवास योजना (आवास), उज्ज्वला योजना (स्वच्छ ऊर्जा), और खाद्य सुरक्षा अधिनियम (अन्न) प्रमुख हैं, जिनका उद्देश्य रोजगार, भोजन, आवास और बुनियादी सुविधाओं के ज़रिए लोगों की आय बढ़ाना और जीवन स्तर सुधारना है, साथ ही डिजिटल इंडिया जैसे प्रयास वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे रहे हैं, हालांकि भ्रष्टाचार और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
प्रमुख सरकारी प्रयास:
- रोजगार सृजन:
- मनरेगा (MGNREGA): ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिन के गारंटीकृत रोजगार के ज़रिए ग्रामीण आय में वृद्धि।
- प्रधानमंत्री रोज़गार योजना (PMRY) और ग्रामीण रोज़गार सृजन कार्यक्रम (REGP): स्वरोजगार और छोटे व्यवसायों को बढ़ावा देना।
- गरीब कल्याण रोज़गार अभियान (GKRA): कोविड-19 के दौरान प्रवासी मजदूरों को तत्काल रोजगार देना।
- खाद्य और पोषण सुरक्षा:
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA): लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों को रियायती दरों पर खाद्यान्न।
- पोषण अभियान और मिड-डे मील: बच्चों और माताओं के पोषण में सुधार।
- आवास और बुनियादी सुविधाएँ:
- प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): सभी के लिए किफायती और सुरक्षित आवास प्रदान करना।
- स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन: स्वच्छ पानी और स्वच्छता सुनिश्चित करना।
- सौभाग्य योजना: बिजली की पहुँच बढ़ाना।
- वित्तीय समावेशन और सशक्तिकरण:
- प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY): सभी के लिए बैंक खाते खोलना।
- महिला सशक्तिकरण योजनाएँ: महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधारना।
- अन्य महत्वपूर्ण पहलें:
- 20 सूत्री कार्यक्रम: गरीबी उन्मूलन के लिए एक व्यापक ढाँचा।
- आत्मनिर्भर भारत: आर्थिक पैकेज के ज़रिए आत्मनिर्भरता और गरीबों को सहायता।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: समग्र शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार।
चुनौतियाँ और चुनौतियाँ:
संसाधनों की कमी, बढ़ती असमानता, भ्रष्टाचार और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में चुनौतियाँ अभी भी हैं, लेकिन डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और लक्षित योजनाओं के माध्यम से गरीबी कम करने के प्रयास जारी हैं और इसमें प्रगति भी देखी गई है।
संसाधनों की कमी, बढ़ती असमानता, भ्रष्टाचार और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में चुनौतियाँ अभी भी हैं, लेकिन डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और लक्षित योजनाओं के माध्यम से गरीबी कम करने के प्रयास जारी हैं और इसमें प्रगति भी देखी गई है।
9. भारत में गरीबी निदान के लिए किए गए गैर सरकारी प्रयासों को बताएं
Ans : - भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ने गरीबी निदान और उन्मूलन के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, सूक्ष्म-वित्त (microfinance), स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और जागरूकता अभियानों के ज़रिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं, जो गरीबों को आत्मनिर्भर बनाने और उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने पर केंद्रित हैं, जिससे समाज के वंचित वर्गों को सशक्त किया जा सके.
मुख्य गैर-सरकारी प्रयास:
- शिक्षा और कौशल विकास (Education & Skill Development):
- NGOs गरीब बच्चों को शिक्षा प्रदान करते हैं और युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण (vocational training) देते हैं, ताकि उन्हें बेहतर रोज़गार मिल सके और वे गरीबी के चक्र से बाहर निकल सकें.
- सूक्ष्म-वित्त और उद्यमिता (Microfinance & Entrepreneurship):
- कई संस्थाएँ गरीबों, विशेषकर महिलाओं, को छोटे ऋण (small loans) देती हैं, जिससे वे अपना छोटा व्यवसाय शुरू कर सकें या अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकें, जैसे नारायण सेवा संस्थान.
- स्वयं सहायता समूह (SHGs) और सशक्तिकरण (Empowerment):
- महिलाएँ स्व-सहायता समूहों में संगठित होकर बचत करती हैं और छोटे सामूहिक उद्यम शुरू करती हैं, जिससे उन्हें आर्थिक और सामाजिक शक्ति मिलती है.
- स्वास्थ्य सेवाएँ (Healthcare Services):
- दूरदराज के इलाकों में कम लागत वाली टेलीमेडिसिन क्लीनिक और स्वास्थ्य शिविर लगाकर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बढ़ाते हैं.
- जागरूकता और आउटरीच (Awareness & Outreach):
- NGOs सरकारी योजनाओं और लाभों के बारे में लोगों को जागरूक करते हैं और उन्हें इन योजनाओं का लाभ उठाने में मदद करते हैं.
- स्थानीय आजीविका कार्यक्रम (Local Livelihood Programs):
- स्थानीय ज़रूरतों को समझकर कृषि, कारीगरी और अन्य क्षेत्रों में स्थायी आजीविका के अवसर पैदा करते हैं.
उदाहरण:
- नारायण सेवा संस्थान: भोजन वितरण और राशन योजनाएँ चलाता है, ताकि कोई भूखा न सोए.
- स्माइल इंडिया ट्रस्ट: असहायों को पका हुआ भोजन और ज़रूरतें पूरी करने में मदद करता है.
- गरीबी उन्मूलन (End Poverty in India): बालिका शिक्षा, ग्रामीण विकास और सतत आजीविका पर काम करता है.
इन प्रयासों से NGO भारत के सामाजिक ताने-बाने को मजबूत कर रहे हैं और गरीबी उन्मूलन में सरकार के प्रयासों को पूरक बना रहे हैं.
10. बिहार में ग्रामीण गरीबी की क्या स्थिति है
Ans बिहार में ग्रामीण गरीबी में भारी गिरावट आई है (2011-22 में 40.1% से 5.9% तक), लेकिन नीति आयोग के 2021 के सूचकांक के अनुसार यह अभी भी देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी प्रमुख है, हालांकि यह 2015-16 की तुलना में काफी सुधरी है और गरीबी उन्मूलन के प्रयासों में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है।
- बिहार देश का सबसे गरीब राज्य: 51.91% आबादी गरीब, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी (0.286 स्कोर) शहरी क्षेत्रों (0.117 स्कोर) से अधिक है।
- गरीबी के मुख्य जिले: किशनगंज (64.75%), अररिया (64.65%), मधेपुरा (64.35%)।
- तेज गिरावट: 2011-12 से 2022-23 के बीच ग्रामीण गरीबी में 85.3% की कमी आई, जो देश में सबसे तेज़ गिरावट है (40.1% से 5.9% तक)।
- पड़ोसी राज्यों से बेहतर: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से भी तेज़ी से गरीबी कम हुई है।
- बेहतर सूचकांक: बिजली, स्वच्छ ईंधन, बैंक खातों जैसे सूचकांकों पर बेहतर प्रदर्शन।
11. बिहार में ग्रामीण गरीबी के चार प्रमुख कारणों को बताएँ
Ans- बिहार में ग्रामीण गरीबी के चार मुख्य कारण हैं: कृषि पर अत्यधिक निर्भरता (आधुनिक तकनीक और संसाधनों की कमी के कारण कम उत्पादन), भूमि का असमान वितरण (छोटे किसानों की बढ़ती संख्या), शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव (बेहतर रोजगार के अवसरों की कमी), और बेरोजगारी व अपर्याप्त बुनियादी ढांचे (सड़क, बिजली, उद्योग की कमी)।
यहां बिहार में ग्रामीण गरीबी के चार प्रमुख कारण दिए गए हैं:
- कृषि पर निर्भरता और कम उत्पादकता: ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है, लेकिन सिंचाई, बीज और उर्वरक जैसी आधुनिक तकनीकों और संसाधनों की कमी के कारण फसल उत्पादन कम होता है, जिससे आय कम रहती है।
- भूमि का असमान वितरण: कृषि भूमि का अधिकांश हिस्सा कुछ बड़े भूस्वामियों के पास है, जबकि अधिकांश ग्रामीण या तो बहुत छोटे भूखंडों के मालिक हैं या भूमिहीन हैं, जिससे उनकी आय सीमित हो जाती है।
- शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है, जिसके कारण कार्यबल अकुशल रहता है और बेहतर रोजगार के अवसर नहीं मिल पाते हैं।
- बेरोजगारी और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा: गांवों में रोजगार के अवसर बहुत कम हैं, और खराब सड़कें, बिजली और औद्योगिक विकास की कमी के कारण गैर-कृषि क्षेत्र में रोजगार नहीं बन पाते हैं।
Ans :- बिहार में ग्रामीण गरीबी के निदान के लिए शिक्षा और कौशल विकास, रोजगार सृजन, कृषि में सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और सामाजिक सुरक्षा व वित्तीय समावेशन जैसे पांच प्रमुख उपाय अपनाए जा सकते हैं, जिससे लोगों की आय बढ़े, उनकी क्षमता विकसित हो और उन्हें मूलभूत सुविधाएं मिलें.
पांच प्रमुख उपाय:
- शिक्षा और कौशल विकास (Education & Skill Development):
- ग्रामीण युवाओं को रोजगारपरक शिक्षा और प्रशिक्षण देना, ताकि वे बेहतर आय अर्जित कर सकें.
- 'स्किल इंडिया' जैसी योजनाओं के माध्यम से व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करना.
- रोजगार के अवसरों का सृजन (Employment Generation):
- 'मनरेगा' (MGNREGA) जैसी योजनाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में काम की गारंटी देना और मजदूरी बढ़ाना.
- स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए 'बिहार उद्यमी योजना' जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करना.
- कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में सुधार (Agricultural Reforms):
- किसानों को बेहतर बीज, खाद और सिंचाई की सुविधा देना, साथ ही कृषि उत्पादकता बढ़ाना.
- भूमि सुधारों को लागू करना ताकि भूमिहीन किसानों को लाभ मिले और उनकी आय बढ़े.
- स्वास्थ्य और पोषण (Health & Nutrition):
- ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं (अस्पताल, दवाएं, डॉक्टर) की पहुंच सुनिश्चित करना.
- बच्चों और महिलाओं में कुपोषण दूर करने के लिए 'मिड-डे मील' जैसी योजनाओं को मजबूत करना.
- सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय समावेशन (Social Security & Financial Inclusion):
- 'जन-धन योजना' के तहत बैंक खाते खोलना और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच देना.
- पेंशन योजनाओं (वृद्धावस्था/विधवा) और बीमा योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाना.
Long Answer
भारत में गरीबी रेखा को मुख्य रूप से प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय (per capita monthly consumption expenditure) के आधार पर परिभाषित किया गया है, जिसमें व्यक्ति को भोजन, वस्त्र, आवास जैसी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक न्यूनतम आय या व्यय को मापा जाता है; पहले कैलोरी की मात्रा (ग्रामीण 2400, शहरी 2100) भी आधार थी, लेकिन अब इसे उपभोग व्यय और गैर-खाद्य ज़रूरतों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य) के साथ जोड़ा गया है, जिसमें तेंदुलकर और रंगराजन जैसी समितियों ने अलग-अलग आंकड़े दिए हैं, पर सरकारी तौर पर उपभोग व्यय ही प्रमुख है।
गरीबी रेखा को परिभाषित करने के मुख्य तरीके:
- कैलोरी आधारित विधि (पुराना): योजना आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी प्रतिदिन निर्धारित की थी, जिसे पूरा न कर पाने वाले को गरीब माना जाता था।
- उपभोग व्यय आधारित विधि (वर्तमान):
- तेंदुलकर समिति (2009): इसने कैलोरी के साथ-साथ गैर-खाद्य वस्तुओं (शिक्षा, स्वास्थ्य, कपड़े) पर होने वाले खर्च को भी शामिल किया और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग ₹816 और शहरी क्षेत्रों में ₹1000 मासिक उपभोग व्यय (2011-12 के आंकड़े) को गरीबी रेखा माना।
- रंगराजन समिति (2014): इसने तेंदुलकर समिति से अधिक आंकड़े दिए, ग्रामीण क्षेत्रों में ₹972 और शहरी क्षेत्रों में ₹1407 प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय को गरीबी रेखा बताया, लेकिन सरकार ने इसे पूरी तरह नहीं अपनाया।
- आधुनिक दृष्टिकोण (नीति आयोग): नीति आयोग बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) का उपयोग करता है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के कई पहलुओं को देखा जाता है, न कि केवल आय या कैलोरी को।
निष्कर्ष:
आज भी भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण मुख्य रूप से एनएसएसओ (NSSO) के मासिक उपभोग व्यय सर्वेक्षणों के आधार पर होता है, जिसमें खाद्य और गैर-खाद्य दोनों वस्तुओं पर होने वाले खर्च को देखा जाता है, ताकि व्यक्ति की बुनियादी ज़रूरतों के पूरा होने का आकलन किया जा सके।
आज भी भारत में गरीबी रेखा का निर्धारण मुख्य रूप से एनएसएसओ (NSSO) के मासिक उपभोग व्यय सर्वेक्षणों के आधार पर होता है, जिसमें खाद्य और गैर-खाद्य दोनों वस्तुओं पर होने वाले खर्च को देखा जाता है, ताकि व्यक्ति की बुनियादी ज़रूरतों के पूरा होने का आकलन किया जा सके।

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